जीवन ज्ञान (ओंकार ठाकुर ) व्यथित, विक्षिप्त, अविराम चलते चलते रुक जाता हूँ थक कर एक तरु की छाया में | पीछे देखता हूँ एक सूना सा पथ अनगिनत क़दमों से रुन्धा पदचिन्ह रहित ऊषा-सांझ को मिलाता निश्चल है जैसे अभिषप्त विषधर | ऊपर देखता हूँ एक तुंड-मुंड तरु जिस के पत्ते उड़ चुके हैं पतझड़ की पवन मैं | वह बोला . . . असंख्य वसन्त देखे हैं मैंने किन्तु कुछ वर्षों से रुष्ट है निर्मोही निष्ठुर | अकस्मात् . . . . तरु-शिखर पर बैठा भयवाह गिद्ध पंख फैलता है बोध कराने अपनी उपस्थिति का | उस के रक्तिम नेत्रों मैं एक आवाहन “पन्थी, बसेरा यहीं कर लो” वशीकृत सी शिथिलता में गिरता हूँ आत्म-बोध खो कर | यह स्वप्न है या यथार्थ ? तभी सुगन्धित समीर का झोंका झिझोड़ता है मुझे निकट कहीं उपवन है एक चेतना स्फूर्त करती है मुझे और मैं विगत पथ, गिद्ध व तरु सभी को भूल हुआ अग्रसर अपन...
Hindi poems, poetry, Urdu ghazals, Shayeri in Hindi Devnagri script